नेटफ्लिक्स डाक्यूमेंट्री "द मैन विद 1000 किड्स"  का विकी डोनर वास्तविक है !

तक़रीबन डेढ़ दशक पहले बॉलीवुड की स्पर्म डोनर पर बनी फ़िल्म "विकी डोनर" आई थी.  बहुतों ने देखी थी और बतौर कॉमेडी खूब एन्जॉय भी की थी. शुजित सरकार ने स्पर्म डोनेशन सरीखे सेंसिटिव सब्जेक्ट को कॉमिक ट्रीटमेंट दिया था और वे सफल भी हुए. स्पर्म डोनेशन के साइंस और इंसानी जिंदगी के इमोशन्स को इस फिल्म में निर्देशक ने बिना किसी उलझन के पेश किया था. 

एक पुरुष के अपने स्पर्म डोनेशन का उद्देश्य यह है कि इसका उपयोग कृत्रिम गर्भाधान या अन्य "प्रजनन उपचार" में एक या अधिक महिलाओं के लिए किया जाए जो उसकी यौन साथी नहीं हैं ताकि वे उससे गर्भवती हो सके. चूँकि गर्भधारण पूर्ण अवधि तक होता है, स्पर्म डोनर अपने दान से पैदा होने वाले प्रत्येक बच्चे का जैविक पिता होगा. जैविक पिता बोले तो 'बायोलॉजिकल फादर' जिसकी पिछले दिनों खूब चर्चा हो रही थी. देश के पीएम ने कहा कि वे बायोलॉजिकल नहीं हैं तो क्या स्वयं को वे भगवान कह रहे थे ? क्योंकि नॉन बायोलॉजिकल तो इंसान हो ही नहीं सकता ! 

डॉक्यूमेंट्री जोनाथन जैकब मीजेर द्वारा तक़रीबन डेढ़ दशक तक अपने स्पर्म डोनेट किये जाने के बारे में हैं, जिनका मानना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया और उसके ऐसा करने से हजारों लोगों की जिंदगी में खुशियां आई हैं. परंतु वह सही होते यदि वे अपनी कथित परोपकारिता से कुछेक महिलाओं को ही उपकृत करते. वे तो सीरियल स्पर्म डोनर बन गए ! नीदरलैंड की अदालत द्वारा इस शख्स पर 2017 में फर्टिलिटी क्लीनिक को स्पर्म डोनेट करने पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि स्पर्म डोनर्स के लिए वहां क़ानून केवल 25 बच्चों तक ही अपनी गतिविधि सीमित रखने का प्रावधान है और जोनाथन पर आरोप था कि उन्होंने नीदरलैंड्स में अकेले 100 बच्चों के जन्म में अपना 'योगदान' दिया. हालांकि प्रावधान पर्पस फुल है इस मायने में कि यदि गतिविधि निर्बाध जारी रखने दी जाए तो कहीं न कहीं गोपनीयता के कोम्प्रोमाईज़ होने का थ्रेट रहेगा. एक बात और, बहुतेरे बच्चों के  कॉमन बायोलॉजिकल फादर होने की स्थिति में किसी के बच्चों के लिए कौटुम्बिक व्यभिचार का रिस्क भी बढ़ जाता है.  इसी बिना पर एक महिला और एक संगठन ने उनके खिलाफ दीवानी मुक़दमा भी दायर किया था. 

एकबारगी लौट आएं बॉलीवुड की फिल्म पर तो उसका किरदार विकी लापरवाह पंजाबी बंदा था, कोई काम धाम था नहीं उसके पास ! एक फर्टिलिटी एक्सपर्ट को विक्की में स्वस्थ और हाई परफार्मिंग स्पर्म डोनर दिखा और उसने उसे पैसे का लालच देकर इस गतिविधि के लिए तैयार कर लिया. अब जब पैसे मिलने लगे तो बात वह हो गई जो संत कबीर ने कही थी, "लूट सके तो लूट ले , राम नाम की लूट ; पाछे फिर पछताओगे , प्राण जाहि जब छूट ! लेकिन, विक्की का स्पर्म डोनर होना उसकी लाइफ में आगे परेशानियां लाता है, जिनका अंत ठीक वैसे ही होता है जैसे जोनाथन कहता है कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया और उसके स्पर्म डोनेट करने से सैंकड़ों लोगों की जिंदगी में खुशियां आई हैं.  विक्की के मामले में एक्सपर्ट इन खुशहाल जिंदगियों का हवाला देकर न केवल उसे बल्कि उसके परिवार को भी कन्विंस कर देता है. 

जोनाथन ने स्पर्म की बिक्री जारी रखी और डच अधिकारियों का अनुमान था कि मात्र एक साल में ही  उन्होंने दुनिया भर में लगभग 1000 बच्चों के जन्म में अपना 'योगदान' दिया था. जोनाथन के खिलाफ तय किए गए आरोपों से पता चला कि उन्होंने जानबूझकर सैकड़ों परिवारों से झूठ बोला कि वे अतीत में कितने बच्चों के लिए स्पर्म डोनेट कर चुके हैं. नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही डॉक्यूमेंट्री जोनाथन की चालाकियों का खुलासा करती है, उन महिलाओं का साक्षात्कार दिखाती है जिन्हें जब पता चला कि जोनाथन तो पेशेवर है और स्पर्म डोनेशन को धंधा बना लिया है उन्होंने. महिलायें उदास और  नाराज थीं क्योंकि वे  खुद को ठगा सा महसूस कर रही थीं. 

डॉक्यूमेंट्री में ही एक महिला ठीक ही तो कह रही है कि ये बच्चे एक दिन मिलेंगे और एक दूसरे के प्यार में पड़ जाएंगे क्योंकि वे एक दूसरे में कोई कॉमन बात खोज लेंगे और उन्हें ये नहीं मालूम होगा कि उनका जन्म एक ही डोनर पैरेंट से हुआ है. हालांकि डॉक्युमेंट्री में भाग लेने से जोनाथन ने इनकार कर दिया.  

चूँकि मामला अदालत में पहुंचा, जोनाथन ने ये बात कबूल की है कि वे 550 से 600 के बीच बच्चों के जन्म के लिए जिम्मेदार हैं. जबकि अदालत का कहना है कि कई उपमहाद्वीपों में जोनाथन के लगभग एक हज़ार बच्चे हैं. आखिरकार जोनाथन के मामले की सुनवाई कर रहे जज ने उन्हें और पैरेंट्स को स्पर्म डोनेट करने से बैन कर दिया. अदालत ने ये भी कहा है कि हरेक स्पर्म डोनेशन के लिए उन पर एक लाख डॉलर का जुर्माना लगाया जाएगा.
निष्कर्ष यही है कि जोनाथन की गतिविधि औचित्य खो देती है जब वे इसे व्यापकता प्रदान कर देते हैं. कारण जो भी हो, उनका उद्देश्य पैसा कमाना हो या फिर उनकी आदर्श सरीखी बात मान लें कि वे तो ख़ुशियाँ बांट रहे हैं. क्योंकि ये ख़ुशी दीगर खुशियों से सर्वथा भिन्न इस मामले में हैं कि कोई खुश व्यक्ति अपनी इस खास ख़ुशी के प्रदाता को किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता ! कुल मिलाकर डॉक्यूमेंट्री देखकर एक खालीपन सा लगता है, मन उत्साह से रहित होता प्रतीत होता है, एक डर सा लगता है कि आधुनिक युग में बच्चे की चाह किस कदर खतरनाक हो सकती है.   

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Prakash Jain

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